कश्मीर की कली और इंस्टाग्राम की मुहब्बत

नई- नई धर्म परिवर्तित करने वाली महिलाओं का निष्ठावान होना..

कभी-कभी लगता है कि दुख,त्रासदी और इतिहास की छायाएं कुछ खास लोगों की प्रोफाइल तक पहुंचती ही नहीं। वे फिल्टर और कैप्शन के उस पार के संसार में रहती हैं, जहाँ सिर्फ "सुंदर दृश्य," "लव यू हबी," "कश्मीरी कॉफी" और "प्योर वाइब्स" होते हैं। और अगर गलती से कोई नरसंहार, विस्थापन या ऐतिहासिक घाव सामने आ भी जाएं, तो उन्हें “इग्नोर” कर देना ही बेहतर समझा जाता है—क्योंकि इंस्टाग्राम की दुनिया में "पॉजिटिविटी ओनली" चलती है।

हम बात कर रहे हैं एक टीवी कलाकार की, जो हाल ही में अपने नवनिर्मित पति—माफ कीजिएगा, नवधर्मी जीवनसाथी—के साथ कश्मीर भ्रमण पर गईं। जैसे ही श्रीनगर की वादियों में कदम रखा, वैसे ही उनकी संवेदनशीलता ने एयरपोर्ट पर ही बूट्स चेंज करते वक्त बैग में रख दी गई होगी। रोजाना 10 स्टोरीज़, 4 रील्स और एक लंबा कैप्शन: "ये धरती जन्नत है, यहाँ आकर आत्मा को शांति मिलती है..."

शायद उन्हें नहीं पता कि यह धरती अभी अभी रक्त रंजीत हुई है,आत्माओं की चिताएं धधक रही हैं या फिर, पता है लेकिन वो अखबार पढ़ने नहीं, हैशटैग गिनने गई थीं।

अद्भुत है यह आत्म-मुग्धता! पहलगाम पर एक संवेदना नहीं। वहाँ खून के धब्बे मिटे नहीं और ये मैडम "ब्लश कुर्ती में कश्मीर, शिकारा की वादियों में वाइब" बिखेर रही हैं। वहां की दीवारें गवाह हैं दर्द की, और इन्होंने वहाँ खींची तस्वीर को "एस्थेटिक" फिल्टर से ढक दिया।

उनका धर्म परिवर्तन तो कुछ वर्ष पूर्व ही हुआ था, पर आत्मा का परिवर्तन शायद इंस्टाग्राम के एल्गोरिद्म के हिसाब से होता है—जो दिखे वही सही, जो बिके वही सही।

कभी कश्मीर के उन पंडितों की बस्ती में भी जातीं, जो आज भी "घर वापसी" का सपना लिए टिन की झोपड़ियों में रह रहे हैं। पर नहीं, वहाँ “एस्थेटिक बैकग्राउंड” नहीं है और शायद वायरल होने लायक मटीरियल भी नहीं।
सोचिए, इतिहास का लहू अब सेल्फी की हँसी में डूब चुका है। और संवेदना? वह एक पुरानी किताब है, जिसे अब किसी ने बुकमार्क नहीं किया।
©®पायल लक्ष्मी सोनी

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