रिश्तों का विघटन और उपभोक्तावाद का उत्थान
भारत को समझना है तो उसकी इमारतों से नहीं, उसके आँगनों से समझिए। उन आँगनों से, जहाँ एक साथ हँसी गूँजती थी, जहाँ दादी की कहानियाँ थीं, नानी के किस्से थे, और माँ के हाथ का खाना सिर्फ पेट नहीं, मन भी भर देता था। भारत की असली ताकत कभी उसकी सेना, अर्थव्यवस्था या राजनीति नहीं रही। उसकी सबसे बड़ी शक्ति रहा है उसका संयुक्त परिवार। तीन पीढ़ियाँ एक छत के नीचे, अनुभव, प्रेम और जिम्मेदारी का साझा संसार। यही वह ढाल थी जिसने भारत को हर आक्रमण, हर संकट और हर कठिन दौर में भीतर से टूटने नहीं दिया।
मुग़ल आए, अंग्रेज़ आए, लूट हुई, शासन बदले, लेकिन भारतीय समाज की रीढ़ नहीं टूटी। क्योंकि परिवार साथ था। बुज़ुर्ग बोझ नहीं थे, मार्गदर्शक थे। बच्चे अकेले नहीं थे, संस्कारों में पले थे। खर्च व्यक्तिगत नहीं, सामूहिक था। सुख-दुख साझा था। यही हमारी असली सोशल सिक्योरिटी थी। न पेंशन की चिंता, न वृद्धाश्रम की ज़रूरत, न अकेलेपन का डर, न मानसिक स्वास्थ्य पर भारी खर्च। समस्या होती थी तो घर में हल निकल आता था।
लेकिन फिर एक दौर आया, जिसे हमने “आधुनिकता” कहकर सिर आँखों पर बैठा लिया। दरअसल यह आधुनिकता नहीं थी, यह एक रणनीति थी। एक ऐसी सोच, जिसका मूल मंत्र था। व्यक्ति को अकेला करो, ताकि वह उपभोक्ता बने। क्योंकि जो अकेला होता है, वही सबसे ज़्यादा खरीदता है। पश्चिमी दुनिया के लिए भारत हमेशा एक समस्या रहा, क्योंकि यहाँ लोग कम खर्च करते थे, ज़रूरत से ज़्यादा नहीं खरीदते थे, और सबसे बड़ी बात - साझा करते थे। जहाँ साझा होता है, वहाँ बाज़ार नहीं फलता।
इसलिए सबसे पहले हमारे परिवारों पर हमला हुआ। यह हमला तलवार से नहीं, विचार से था। मीडिया के ज़रिए, मनोरंजन के नाम पर, हमारे घरों को झगड़ों का केंद्र बताया गया। संयुक्त परिवार को पिछड़ा, बोझिल और रुकावट के रूप में पेश किया गया। सास-बहू के रिश्ते को ज़हर की तरह दिखाया गया और हर कहानी का अंत एक ही सलाह पर हुआ - अलग हो जाओ। न्यूक्लियर परिवार को आज़ादी, प्रगति और आत्मनिर्भरता का प्रतीक बना दिया गया। धीरे-धीरे यह बात हमारे दिमाग में बैठा दी गई कि साथ रहना कमजोरी है और अलग रहना ताकत।
फिर आया उपभोक्तावाद। एक परिवार टूटा और चार घर बन गए। एक टीवी चार हो गए। एक रसोई चार किचन सेट में बदल गई। एक वाहन कई वाहनों में। बाज़ार खुश हुआ, लेकिन समाज भीतर से दरक गया। जहाँ पहले रिश्ते थे, वहाँ अब सुविधाएँ हैं। जहाँ पहले अपनापन था, वहाँ अब औपचारिकता है। बुज़ुर्ग अब अनुभव का खजाना नहीं, “जिम्मेदारी” कहे जाने लगे। बच्चे परिवार के बीच नहीं, मोबाइल और स्क्रीन के बीच बड़े होने लगे।
आज हम जिस मानसिक स्वास्थ्य संकट की बात करते हैं, वह अचानक पैदा नहीं हुआ। यह उसी सोच का परिणाम है जिसने हमें अकेला किया। पहले जो बातें नानी-दादी से होती थीं, अब काउंसलर से होती हैं। पहले जो दर्द परिवार के साथ बैठकर हल्का हो जाता था, अब उसके लिए दवाइयाँ और थेरेपी चाहिए। अकेलापन अब बीमारी है, जबकि कभी वह प्यार से दूर हो जाता था। संस्कार, जो घर से मिलते थे, अब इन्फ्लुएंसर्स सिखा रहे हैं। हर भावना के लिए एक ऐप है, हर समस्या के लिए एक उत्पाद, और हर त्योहार के लिए एक ऑनलाइन ऑर्डर।
हमने आधुनिक बनने की दौड़ में बहुत कुछ छोड़ दिया। संयुक्तता को आउटडेटेड कहा। माता-पिता को बाधा समझा। परिवार को फालतू भावना कहा। रिश्तों को अनफॉलो कर दिया। हमने यह नहीं सोचा कि जिन प्लेटफॉर्म्स को हम अपनी सुविधा मान रहे हैं, वे तभी फलते हैं जब हम अकेले होते हैं। जब दीवाली पर परिवार साथ नहीं बैठता, तब ऑनलाइन शॉपिंग बढ़ती है। जब माँ के हाथ का खाना नहीं होता, तब फूड डिलीवरी फलती है। जब दादी की कहानी नहीं होती, तब स्क्रीन चलती है।
नीतियों और नारों ने भी इस सोच को मजबूत किया। जनसंख्या नियंत्रण के नाम पर “हम दो हमारे दो” और “छोटा परिवार सुखी परिवार” जैसे नारे दिए गए। हमने बिना सवाल किए इन्हें अपनाया। आज हालत यह है कि “हम दो” भी बोझ लगने लगा है और “हम एक” को आदर्श बताया जा रहा है। परिवार छोटा होता गया, रिश्ते सिमटते गए और समाज कमजोर होता चला गया।
अब सवाल यह नहीं है कि हम आधुनिक हैं या नहीं। सवाल यह है कि हम इंसान रह पा रहे हैं या नहीं। विकास का अर्थ अपनी जड़ों को काटना नहीं होता। तकनीक सुविधा दे सकती है, लेकिन जीवन का अर्थ नहीं। ऐप अकेलापन कम नहीं कर सकता, अपनापन ही कर सकता है। सामान त्योहार नहीं बना सकता, लोग बनाते हैं। अनुभव गूगल से नहीं मिलता, बुज़ुर्गों से मिलता है।
समाधान अभी भी संभव है। हमें संयुक्त परिवार को फिर से बोझ नहीं, संपत्ति मानना होगा। बच्चों को केवल उपभोक्ता नहीं, संस्कारी मनुष्य बनाना होगा। बुज़ुर्गों को घर से बाहर नहीं, घर के केंद्र में रखना होगा। त्योहार सामान से नहीं, साथ से मनाने होंगे। अकेलेपन का इलाज सब्सक्रिप्शन से नहीं, संबंधों से होगा।
अंततः सच्चाई यही है- पश्चिम ने व्यापार के लिए परिवार तोड़े और हमने आधुनिक दिखने के लिए अपना अस्तित्व बेच दिया। अब भी समय है रुकने का, सोचने का और अपने संस्कारों की ओर लौटने का। नहीं तो आने वाली पीढ़ी को संयुक्त परिवार का अर्थ समझाने के लिए सचमुच किसी सर्च इंजन की ज़रूरत पड़ जाएगी। और तब शायद बहुत देर हो चुकी होगी।
©®पायल लक्ष्मी सोनी
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