मौन का मार्क्सवादी महोत्सव
देश का सबसे ज्यादा बेड़ा गर्क अगर किसी ने किया है, तो वो हैं हमारे वामपंथी इतिहासकार और लेखकों की वह जमात, जिन्होंने स्याही से नहीं, छल-कपट से इतिहास लिखा। उन्होंने तथ्यों को मरोड़ा, पीड़ाओं को वर्ग संघर्ष में घोल दिया, और जब भी कोई सभ्यता कराह उठी, तो उसकी आवाज को 'बहुसंख्यक वर्चस्ववाद' कहकर कुचल दिया। कभी-कभी लगता है इन लेखकों के शब्दकोश में ‘सच’ शब्द नहीं, 'सेलेक्टिव साइलेंस' होता है। अभी हाल ही में एक प्रसिद्ध लेखिका ने, जो साहित्य अकादमी से लेकर इंस्टाग्राम की कविताओं तक हर मंच पर प्रगतिशीलता का झंडा उठाए रहती हैं, बड़ी आत्मा-विह्वलता से कहा—"ऐसी हैवानियत देखकर चुप रहना अच्छा है।" मतलब…? यानी जब राक्षसी कृत्य हो, तो कलम नीचे रख दो, आँखे मूंद लो, और संवेदना का मुँह स्टोरी मोड में छुपा दो। यह वही जमात है जो किसी एक वर्ग की पीड़ा पर शोर मचाती है, और दूसरे की त्रासदी पर footnote भी नहीं लिखती। इनका इतिहास का प्रेम भी बड़ा अद्भुत है। इनके अनुसार भारत में बस दो ही ऐतिहासिक घटनाएँ हुई हैं—एक मुग़ल काल का "गंगा-जमुनी तहज़ीब" और दूसरी ब्रिटिश काल...