साहित्य : समाज का दर्पण और दिशा - दर्शक
साहित्य को केवल शब्दों का संसार नहीं कहा जा सकता है। साहित्य समाज की सोच, उसकी संवेदनाओं, उसके संघर्षों और उसके सपनों को आवाज देता है। इसलिए कहा जाता है कि साहित्य समाज का दर्पण है। लेकिन साहित्य केवल समाज को दिखाता ही नहीं, बल्कि कई बार समाज को सोचने और बदलने की दिशा भी देता है।
हमारे आसपास जो कुछ घटता है, उसका प्रभाव साहित्य पर पड़ता है और फिर वही साहित्य समाज को प्रभावित करता है। यानी साहित्य और समाज का संबंध बहुत गहरा है। किसी देश या समाज को समझना हो तो उसके साहित्य को पढ़ना बहुत जरूरी है।
भारत की बात करें तो हमारे यहां साहित्य की परंपरा बहुत पुरानी है। रामायण, महाभारत, पुराण, भक्ति साहित्य, लोककथाएं और आधुनिक साहित्य- इन सबने हमारी सामाजिक और सांस्कृतिक सोच को प्रभावित किया है। कबीर ने अपने दोहों के माध्यम से समाज में फैले आडंबर और भेदभाव पर सवाल उठाए। तुलसीदास ने राम के माध्यम से मर्यादा और कर्तव्य का संदेश दिया। प्रेमचंद ने किसान, गरीबी, स्त्री और सामाजिक असमानता को अपनी कहानियों और उपन्यासों का विषय बनाया।
यही साहित्य की सबसे बड़ी ताकत है कि वह ऐसी बात भी कह देता है जिसे सामान्य व्यक्ति सीधे कहने में संकोच करता है।
यह सत्य ही कि साहित्य समाज को संवेदनशील बनाता है। आज हम एक बहुत तेज जिंदगी जी रहे हैं। हर व्यक्ति अपने काम, परिवार और समस्याओं में व्यस्त है। ऐसे समय में साहित्य हमें दूसरे व्यक्ति के दुख को समझने का अवसर देता है।
जब हम किसी गरीब किसान की कहानी पढ़ते हैं तो केवल किसान के बारे में जानकारी नहीं मिलती, बल्कि उसकी परेशानियों को महसूस करने का अवसर मिलता है। जब हम किसी स्त्री की पीड़ा पढ़ते हैं तो उसके संघर्ष को समझ पाते हैं। यही संवेदना समाज को बेहतर बनाती है।
प्रेमचंद की गोदान इसका अच्छा उदाहरण है। कहानी में होरी केवल एक पात्र नहीं रह जाता, बल्कि वह उस किसान का प्रतिनिधि बन जाता है जो गरीबी, कर्ज और सामाजिक परिस्थितियों के बीच संघर्ष करता है।
साहित्य ने हमेशा समाज की गलत बातों को सामने रखने का काम किया है। बाल विवाह, दहेज, जातिगत भेदभाव, गरीबी, शोषण, स्त्री की स्थिति जैसी अनेक समस्याएं साहित्य में उठाई गई हैं।
महादेवी वर्मा ने स्त्री जीवन और उसकी संवेदनाओं को अपनी रचनाओं में गंभीरता से सामने रखा। प्रेमचंद ने सामाजिक और आर्थिक विषमता पर लिखा। कबीर ने जाति और धार्मिक आडंबर के विरुद्ध अपनी स्पष्ट आवाज उठाई।
इस प्रकार साहित्य कई बार समाज के सामने आईना रख देता है और पूछता है- क्या हम सचमुच ऐसा ही समाज बनाना चाहते हैं?
साहित्य का एक महत्वपूर्ण काम अपनी संस्कृति और इतिहास को अगली पीढ़ी तक पहुंचाना भी है। हमारी लोककथाएं, लोकगीत, कविताएं और धार्मिक ग्रंथ हमारी सांस्कृतिक स्मृति का हिस्सा हैं।
स्वतंत्रता आंदोलन के समय भी साहित्य और कविता ने लोगों में राष्ट्रभावना जगाने का काम किया। माखनलाल चतुर्वेदी की पुष्प की अभिलाषा और सुभद्रा कुमारी चौहान की झांसी की रानी जैसी रचनाओं ने देशभक्ति की भावना को मजबूत किया।
आज भी जब हम ऐसी रचनाएं पढ़ते हैं तो हमारे भीतर अपने देश और उसकी मिट्टी के प्रति जुड़ाव पैदा होता है।
लेकिन साहित्य का नकारात्मक प्रभाव भी हो सकता है
यह मान लेना भी सही नहीं होगा कि साहित्य हमेशा सकारात्मक ही प्रभाव डालता है। साहित्य एक शक्तिशाली माध्यम है। यदि इसका उपयोग गलत विचारों, झूठी जानकारी या नफरत फैलाने के लिए किया जाए तो इसका प्रभाव भी गलत हो सकता है।
आज सोशल मीडिया के समय में कोई भी व्यक्ति कुछ भी लिखकर हजारों लोगों तक पहुंच सकता है। कई बार बिना तथ्य जांचे इतिहास, धर्म या समाज के बारे में बातें लिख दी जाती हैं। लोग उन्हें सच मान लेते हैं और आगे फैलाते रहते हैं। इससे समाज में भ्रम और तनाव पैदा हो सकता है।
इसी तरह यदि किसी रचना में हिंसा, अपराध, नशे या गलत जीवनशैली को इस तरह दिखाया जाए कि वह आकर्षक लगने लगे, तो युवा पाठकों पर उसका गलत प्रभाव पड़ सकता है। हालांकि किसी बुराई के बारे में लिखना गलत नहीं है। गलत तब होता है जब बुराई को समझाने के बजाय उसका महिमामंडन किया जाए।
विचारधारा भी प्रभावित करती है
साहित्य हमारे विचारों को प्रभावित करता है। इसलिए लेखक की जिम्मेदारी बहुत बड़ी है। यदि कोई लेखक किसी विचारधारा को ही अंतिम सत्य बताकर दूसरी सोच रखने वाले व्यक्ति को गलत या दुश्मन बताता रहे, तो पाठक के मन में कट्टरता पैदा हो सकती है।
हमें साहित्य पढ़ते समय यह समझना चाहिए कि लेखक का अपना दृष्टिकोण हो सकता है। किसी लेखक की बात पढ़ना और उसे बिना सोचे सत्य मान लेना दोनों अलग बातें हैं।
विशेषकर इतिहास और सामाजिक विषयों पर लिखे साहित्य को पढ़ते समय तथ्य और कल्पना के बीच अंतर समझना बहुत जरूरी है। उपन्यास में लेखक कल्पना कर सकता है, लेकिन पाठक को यह समझना चाहिए कि हर साहित्यिक वर्णन ऐतिहासिक तथ्य नहीं होता।
आज के युवाओं के लिए साहित्य क्यों जरूरी है?
आज का युवा मोबाइल और सोशल मीडिया के बीच बड़ा हो रहा है। जानकारी बहुत है, लेकिन गहराई से पढ़ने का समय कम होता जा रहा है। छोटी-छोटी पोस्ट और वीडियो हमारी सोच को प्रभावित कर रहे हैं।
ऐसे समय में साहित्य युवा को रुककर सोचने की आदत देता है। वह भाषा को मजबूत करता है, कल्पना को बढ़ाता है और विचारों को गहराई देता है।
एक अच्छी किताब कई बार वह बात समझा देती है जिसे हजारों सोशल मीडिया पोस्ट नहीं समझा पातीं।
युवाओं को साहित्य से दूर करने के बजाय उन्हें अच्छा साहित्य पढ़ने की आदत डालनी चाहिए। उन्हें केवल मनोरंजन वाली सामग्री ही नहीं, बल्कि इतिहास, जीवनी, कविता, कहानी, दर्शन और समाज से जुड़ी पुस्तकें भी पढ़नी चाहिए।
यह साहित्यकार और पाठक दोनों की जिम्मेदारी है।
लेखक को लिखने की स्वतंत्रता होनी चाहिए। लेकिन स्वतंत्रता का अर्थ जिम्मेदारी से मुक्त होना नहीं है। समाज से जुड़े विषयों पर लिखते समय लेखक को तथ्यों और संवेदनाओं का ध्यान रखना चाहिए।
दूसरी ओर पाठक की भी जिम्मेदारी है। हर लिखी हुई बात सच नहीं होती। किसी भी बात को स्वीकार करने से पहले उसके बारे में सोचना, दूसरे स्रोतों को देखना और अपना विवेक इस्तेमाल करना जरूरी है।
हमें लेखक का सम्मान करना चाहिए, लेकिन अपनी सोचने की शक्ति किसी के पास गिरवी नहीं रखनी चाहिए।
साहित्य समाज को बदलने की क्षमता रखता है। वह हमें संवेदनशील बनाता है, हमारी संस्कृति से जोड़ता है, सामाजिक बुराइयों पर सवाल उठाता है और राष्ट्र के प्रति जिम्मेदारी का भाव पैदा करता है। लेकिन यदि साहित्य तथ्यहीनता, नफरत, हिंसा या गलत विचारों को बढ़ावा देने लगे तो उसका नकारात्मक प्रभाव भी पड़ सकता है।
इसलिए आज जरूरत केवल अच्छे साहित्य की नहीं, बल्कि अच्छे पाठक की भी है।
साहित्य ऐसा होना चाहिए जो हमें बांटे नहीं, सोचने की शक्ति दे; जो केवल मनोरंजन न करे, बल्कि जीवन को समझने की दृष्टि दे।
समाज जैसा होता है, साहित्य में उसकी छाया दिखाई देती है। लेकिन अच्छा साहित्य उस छाया को देखकर समाज को बेहतर बनाने का रास्ता भी दिखाता है। यही साहित्य की असली शक्ति है।
©®पायल लक्ष्मी सोनी
साहित्यकार, पत्रकार, समीक्षक
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