पाठ्य पुस्तकों में हमारी वीरांगनाएँ क्यों नहीं?
आखिर क्या कारण है कि भारत की वीरांगनाओं को हमारी पाठ्य-पुस्तकों में वह स्थान नहीं मिला, जिसकी वे वास्तव में हकदार हैं? इतिहास केवल राजाओं, युद्धों और साम्राज्यों की कहानी ही नहीं हैं। इतिहास उन महिलाओं की गाथा भी है जिन्होंने सत्ता संभाली, राज्य चलाए, प्रशासन किया, सेनाओं का नेतृत्व किया और विदेशी आक्रमणकारियों के सामने अदम्य साहस दिखाया।
पन्ना धाय ने अपने पुत्र का बलिदान देकर मेवाड़ के उत्तराधिकारी की रक्षा की। रानी पद्मावती की कथा त्याग, स्वाभिमान और संघर्ष से जुड़ी है। अहिल्याबाई होलकर ने कुशल शासन का ऐसा उदाहरण प्रस्तुत किया, जिसे आज भी सुशासन के आदर्श के रूप में याद किया जाता है। जीजाबाई ने शिवाजी महाराज के व्यक्तित्व, संस्कार और राष्ट्रचेतना के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। महारानी लक्ष्मीबाई की वीरता का उल्लेख प्रायः सुभद्रा कुमारी चौहान की प्रसिद्ध कविता तक सीमित कर दिया जाता है, जबकि उनका वास्तविक संघर्ष और नेतृत्व कहीं अधिक व्यापक था।
फिर रानी दुर्गावती को हम कितना जानते हैं? गोंडवाना की इस वीर रानी ने अपने राज्य की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए मुगल सेना का सामना किया और रणभूमि में वीरगति प्राप्त की। कित्तूर की रानी चेन्नम्मा ने अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष किया। रानी अब्बक्का चौटा ने पुर्तगालियों के सामने झुकने से इनकार कर दिया। केलाड़ी की रानी चेनम्मा ने कठिन राजनीतिक परिस्थितियों में अपने राज्य की रक्षा की। ताराबाई भोंसले ने मराठा साम्राज्य का नेतृत्व करते हुए औरंगजेब की विशाल सेना का सामना किया। बेगम हजरत महल ने 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में अंग्रेजों के विरुद्ध लखनऊ से नेतृत्व किया। झलकारी बाई ने 1857 में रानी लक्ष्मीबाई के साथ अद्भुत साहस दिखाया। ऊदा देवी ने अंग्रेजों के विरुद्ध युद्ध करते हुए वीरगति पाई। और यह सूची यहीं समाप्त नहीं होती। रानी नायकीदेवी ने गुजरात की धरती पर विदेशी आक्रमण का सामना किया। रानी कर्णावती, और रजिया सुल्तान जैसी महिलाओं ने भी अपने समय की राजनीतिक परिस्थितियों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। दक्षिण भारत में वेलु नचियार ने अंग्रेजों के विरुद्ध सशस्त्र संघर्ष किया और अपनी सेना संगठित की। कितनी ही महिलाएँ ऐसी रहीं जिन्होंने तलवार से नहीं, बल्कि शिक्षा, समाज सुधार और विचारों के माध्यम से भारत के निर्माण में योगदान दिया।
तो फिर प्रश्न उठता है- अगर भारतीय महिलाएँ सदियों से पूरी तरह अधिकारहीन और गुलाम थीं, तो ये महिलाएँ सत्ता में कैसे आईं? उन्होंने राज्यों का संचालन कैसे किया? प्रशासन कैसे संभाला? सेनाओं का नेतृत्व कैसे किया? विदेशी शक्तियों के विरुद्ध युद्ध कैसे लड़ा? क्या यह विरोधाभास हमारे इतिहास-बोध पर प्रश्न नहीं उठाता?
भारतीय इतिहास में स्त्री की स्थिति को केवल एक ही दृष्टि से देखने के बजाय उसकी विविध भूमिकाओं को समझने की आवश्यकता है। भारतीय समाज में समय और स्थान के अनुसार महिलाओं की स्थिति अलग-अलग रही है। कहीं उन्हें अवसर मिले, कहीं सामाजिक बंधनों का सामना करना पड़ा। इसलिए न तो भारतीय स्त्री को सदैव पूर्ण स्वतंत्र बताना उचित है और न ही उसे हर काल में केवल शोषित और अधिकारहीन मान लेना।
हमारे पाठ्यक्रमों में इन वीरांगनाओं को इतिहास-निर्माता के रूप में पढ़ाया जाना चाहिए। हमारी बेटियों को यह जानने का अधिकार है कि उनके इतिहास में ऐसी महिलाएँ भी थीं जिन्होंने सिंहासन संभाला, निर्णय लिए, युद्ध किए और अपने समय की राजनीतिक दिशा बदली।
इतिहास का उद्देश्य केवल अतीत बताना नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ी को अपनी विरासत से परिचित कराना भी है। इसलिए आवश्यकता है कि पाठ्य-पुस्तकों में भारत की वीरांगनाओं और समाज-निर्माता महिलाओं का समुचित, तथ्यपरक और संतुलित स्थान हो।
प्रश्न केवल यह नहीं कि इतिहास में महिलाओं को कितना पढ़ाया गया; प्रश्न यह भी है कि इतिहास लिखते समय महिलाओं के योगदान को कितना देखा और समझा गया?
✍️©®पायल लक्ष्मी सोनी
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