"स्वतंत्रता, स्वच्छंदता और आज़ादी: स्त्री जीवन के तीन आयाम"

मानव जीवन के सबसे महत्वपूर्ण मूल्यों में स्वतंत्रता का स्थान सर्वोपरि है। यह स्वतंत्रता केवल पुरुष के लिए ही नहीं, बल्कि स्त्री के लिए भी उतनी ही अनिवार्य है। परंतु समस्या तब आती है जब "स्वतंत्रता" को "स्वच्छंदता" समझ लिया जाता है और "आज़ादी" को हर बंधन तोड़ देने का अधिकार मान लिया जाता है। खासकर महिलाओं के संदर्भ में यह भ्रम और भी गहरा हो जाता है। आज यह देखने को मिलता है कि वे यह सोचने लगी हैं कि स्वतंत्रता का अर्थ है हर उस जिम्मेदारी से छुटकारा, जो उन्हें पारिवारिक या सामाजिक ढांचे में निभानी पड़ती है। लेकिन क्या सचमुच स्वतंत्रता का यही अर्थ है?
         भारतीय सनातन संस्कृति में स्वतंत्रता और स्वच्छंदता के बीच गहरा अंतर बताया गया है।स्वतंत्रता वह है,जो व्यक्ति को अपने भीतर से विकसित करती है, उसके व्यक्तित्व को निखारती है, और उसे कर्तव्य और अधिकार के बीच संतुलन सिखाती है। वहीं, स्वच्छंदता का अर्थ है- हर बंधन से मुक्त होकर केवल अपनी इच्छाओं और आकांक्षाओं का पीछा करना, चाहे उसका परिणाम समाज या परिवार पर कैसा भी क्यों न पड़े।आज़ादी, इन दोनों से अलग एक व्यापक शब्द है।यह सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक व्यवस्था में बाहरी बंधनों से मुक्ति का प्रतीक है।        
    स्त्री जब स्वतंत्रता की बात करती है तो उसे समझना होगा कि इसका अर्थ केवल अधिकारों की प्राप्ति नहीं, बल्कि जिम्मेदारियों के निर्वाह की स्वतंत्रता भी है। यदि वह शिक्षा पाती है तो यह उसकी स्वतंत्रता है कि वह अपने ज्ञान को समाज और परिवार की प्रगति में लगाए। यदि वह अपने जीवनसाथी चुनने का निर्णय करती है तो यह उसकी स्वतंत्रता है कि वह अपने विवेक से सही और गलत का भेद करके निर्णय ले। स्वतंत्रता स्त्री को अपने निर्णयों का स्वामित्व देती है, परंतु साथ ही यह भी कहती है कि उसके निर्णय से किसी अन्य का जीवन न बिगड़े।
      स्वच्छंदता का अर्थ इससे बिल्कुल भिन्न है। स्वच्छंदता में न कोई अनुशासन होता है, न कोई कर्तव्यबोध। यह केवल इच्छाओं की पूर्ति की ओर ले जाती है। यदि स्त्री कहे कि उसे परिवार से मुक्ति चाहिए, बच्चों की जिम्मेदारी से आज़ादी चाहिए,पति के साथ तालमेल की कोई आवश्यकता नहीं, तो यह स्वतंत्रता नहीं बल्कि स्वच्छंदता है। यह सोच कुछ समय के लिए आकर्षक लग सकती है, परंतु इसके परिणाम अक्सर दुखद होते हैं। क्योंकि परिवार और समाज का ढांचा केवल पुरुष के सहारे नहीं, बल्कि स्त्री के योगदान से भी टिका होता है। यदि स्त्री केवल अपनी इच्छाओं को सर्वोपरि रखेगी तो संतुलन बिगड़ जाएगा और अंततः वह स्वयं भी असंतुष्ट रह जाएगी।
       अब "आज़ादी" की बात करें। आज़ादी एक बाहरी परिस्थिति से जुड़ा हुआ शब्द है। जब देश गुलाम था तो महिलाओं के पास अपनी इच्छा से शिक्षा पाने या निर्णय लेने का अधिकार नहीं था, क्योंकि शासन ही उन्हें बंधनों में जकड़े हुए था। पर आज़ादी मिलने के बाद, कानून और व्यवस्था ने उन्हें यह अधिकार दे दिया है कि वे पुरुषों की तरह शिक्षा, नौकरी और जीवन के सभी अवसर पा सकें। यानी आज़ादी वह है, जो हमें बाहरी शक्ति से मुक्ति दिलाती है। परंतु यह आज़ादी तभी सार्थक है जब इसे स्वतंत्रता में रूपांतरित किया जाए, स्वच्छंदता में नहीं।
            महिलाएं जब कहती हैं कि उन्हें "परिवार से आज़ादी" चाहिए या "जिम्मेदारियों से मुक्ति" चाहिए, तो वे वस्तुतः स्वतंत्रता की नहीं बल्कि स्वच्छंदता की मांग कर रही होती हैं। क्योंकि परिवार से आज़ादी का अर्थ है अपने ही रिश्तों से कट जाना, अपने बच्चों और माता-पिता के प्रति जिम्मेदारियों से भाग जाना। क्या यही स्वतंत्रता है? नहीं। स्वतंत्रता का अर्थ है कि स्त्री अपने परिवार के साथ रहते हुए भी अपनी पहचान बना सके, अपनी इच्छाओं को अभिव्यक्त कर सके, और समाज में अपनी भूमिका निभा सके।
        सनातन संस्कृति में नारी को देवी का दर्जा इसलिए नहीं दिया गया कि वह केवल घर की चौखट में बंधी रहे। उसे स्वतंत्रता दी गई थी- सीता ने अपने निर्णय स्वयं लिए, गार्गी और मैत्रेयी ने वेदांत की चर्चाओं में भाग लिया, रानी लक्ष्मीबाई ने युद्धभूमि में अपने शौर्य का परिचय दिया। यह सब स्वतंत्रता के उदाहरण हैं। लेकिन कहीं भी यह उदाहरण नहीं मिलता कि उन्होंने केवल अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए परिवार या समाज को त्याग दिया।
            स्वच्छंदता और स्वतंत्रता का अंतर यही है कि स्वतंत्रता आत्मानुशासन और जिम्मेदारी से जुड़ी होती है, जबकि स्वच्छंदता केवल सुख की खोज तक सीमित रहती है। स्वतंत्रता वह है, जो स्त्री को ऊँचा उठाती है और समाज के लिए प्रेरणा बनाती है। स्वच्छंदता वह है, जो अंततः स्त्री को अकेलेपन और असंतोष की ओर ले जाती है।
       आज की स्त्रियों को यह भली-भांति समझना होगा कि आज़ादी और स्वतंत्रता में फर्क है। आज़ादी उन्हें मिल चुकी है-शिक्षा का अधिकार,समान अवसर,मतदान का अधिकार,अपने जीवन का निर्णय लेने का अधिकार। अब आवश्यकता है स्वतंत्रता की - यानी इस आज़ादी को जिम्मेदारी के साथ जीने की। यदि वह केवल स्वच्छंदता की ओर जाएगी तो न परिवार बचेगा, न समाज, और न ही उसकी अपनी संतुष्टि।
     महिला अगर स्वतंत्र है तो वह अपने घर को संभालते हुए भी करियर बना सकती है, वह अपने बच्चों की देखभाल करते हुए भी समाज में योगदान कर सकती है। यही संतुलन उसे शक्ति और सम्मान दोनों दिलाता है। पर यदि वह स्वच्छंद होकर हर बंधन को तोड़ देती है तो उसका जीवन बिखर जाता है।
     इसलिए यह भेद समझना अत्यंत आवश्यक है। स्वतंत्रता स्त्री का अधिकार है, स्वच्छंदता उसका भ्रम है, और आज़ादी उसका साधन है। इन तीनों के बीच सही संतुलन बनाकर ही स्त्री अपनी वास्तविक शक्ति को पहचान सकती है। अतः स्त्री को आज़ादी का सदुपयोग करते हुए स्वतंत्रता को अपनाना चाहिए और स्वच्छंदता से दूर रहना चाहिए। तभी वह न केवल अपने लिए बल्कि पूरे समाज के लिए प्रेरणा बन पाएगी। नारी यदि अपनी आज़ादी का सदुपयोग करते हुए स्वतंत्रता का मार्ग चुने और स्वच्छंदता से दूर रहे, तो वह न केवल अपने जीवन को सार्थक बनाएगी, बल्कि समाज और राष्ट्र को भी नई दिशा देगी।


©®पायल लक्ष्मी सोनी 

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