"बेटी को बेटी रहने दें"
भारतीय समाज में सदियों से यह धारणा गहरी जड़ें जमाए हुए है कि बेटा परिवार का सहारा होता है और बेटी एक जिम्मेदारी। इस सोच के कारण बेटियों के पालन-पोषण में अक्सर या तो असमानता दिखाई देती है या फिर उन्हें बेटों जैसा बनाने की कोशिश की जाती है। लेकिन क्या सच में यह आवश्यक है कि बेटी को बेटा बनाया जाए? क्या उसका अस्तित्व केवल इस बात पर निर्भर होना चाहिए कि वह कितनी ‘बेटे जैसी’ है? दरअसल, बेटी को बेटी की तरह पालना ही सबसे बड़ा उपहार है, क्योंकि तभी वह अपने स्त्रीत्व, संवेदनशीलता और आत्मबल को समझ पाती है।
अक्सर हम देखते हैं कि परिवारों में जब बेटियाँ भाइयों के साथ खेलती-बढ़ती हैं तो उनमें टॉमबॉय जैसी आदतें विकसित हो जाती हैं। यह बुरी बात नहीं है, क्योंकि खेल-खेल में साहस, जोश और प्रतिस्पर्धा जैसी खूबियाँ भी विकसित होती हैं। लेकिन समस्या तब आती है जब परिवार या समाज बेटी की पहचान को ‘बेटे जैसे व्यवहार’ से जोड़कर देखना शुरू कर देता है। यह धारणा बेटी के अपने स्त्रीत्व और उसकी आंतरिक पहचान को दबा देती है। एक बेटी को बेटा बनने की ज़रूरत नहीं है, उसे तो खुद अपने रूप में पूर्णता से जीने की स्वतंत्रता चाहिए।
माँ का दायित्व केवल बेटी को बड़ा करने तक सीमित नहीं होता। वह बेटी की पहली गुरु होती है। वह उसे जीवन की बारीकियों, रिश्तों की नाजुकता और आत्मसम्मान की महत्ता सिखाती है। माँ यह समझा सकती है कि स्त्री होना केवल सजने-सँवरने का प्रतीक नहीं, बल्कि आत्मनिर्भर और दृढ़ बने रहने की पहचान है। बेटी जब यह समझ पाती है कि उसका स्त्रीत्व उसकी कमजोरी नहीं बल्कि उसकी ताकत है, तब वह किसी भी परिस्थिति का सामना गरिमा और आत्मविश्वास से कर सकती है।
बेटी को यह सिखाना आवश्यक है कि शिष्टाचार और संवेदनशीलता उसके व्यक्तित्व की शक्ति हैं। उसे यह एहसास होना चाहिए कि दूसरों के प्रति करुणा दिखाना या अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त करना उसकी कमजोरी नहीं है। बल्कि यही गुण उसे दूसरों से अलग बनाते हैं और समाज में एक गहरी छाप छोड़ने में मदद करते हैं। यदि माँ इस दिशा में बेटी का मार्गदर्शन करती है, तो वह न केवल अपने जीवन को संतुलित बना पाती है, बल्कि समाज में भी सकारात्मक भूमिका निभाती है।
आज की दुनिया में, जहाँ हर क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा है, वहाँ बेटी को जिम्मेदारी उठाना और अपने निर्णयों पर कायम रहना भी सिखाना ज़रूरी है। बेटियाँ अक्सर भावुक मानी जाती हैं, लेकिन जब उन्हें निर्णय लेने की स्वतंत्रता और अपने फैसलों पर डटे रहने की हिम्मत दी जाती है, तो वे किसी भी चुनौती को सहजता से स्वीकार कर सकती हैं। आत्मनिर्भरता और दृढ़ता तभी आती है जब उन्हें यह भरोसा दिलाया जाए कि उनके फैसले का सम्मान किया जाएगा। माँ का यह विश्वास बेटी के आत्मबल को दोगुना कर देता है।
समाज में बेटियों के प्रति दृष्टिकोण धीरे-धीरे बदल रहा है, लेकिन अभी भी पूरी तरह नहीं बदला। कई बार माता-पिता बेटियों को सुरक्षा की चिंता में सीमाओं में बाँध देते हैं। परंतु यह समझना जरूरी है कि सुरक्षा और स्वतंत्रता एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। यदि बेटी को आत्मरक्षा, आत्मनिर्भरता और सही-गलत का भेद करना सिखाया जाए तो वह अपने लिए सुरक्षित रास्ते खुद बना सकती है। माँ-बेटी का रिश्ता इस संदर्भ में बेहद खास है, क्योंकि माँ ही उसे बताती है कि समाज के दबावों और परंपराओं के बीच अपनी पहचान कैसे बनाए रखी जाए।
बेटी को बेटी की तरह पालने का मतलब यह नहीं कि उसे कमजोर बनाया जाए। इसका अर्थ है उसे उसकी वास्तविकता और सामर्थ्य के साथ जीने देना। जब हम बेटी से यह अपेक्षा रखते हैं कि वह बेटे जैसी हो, तो हम उसके स्त्रीत्व को नकारते हैं। जबकि सही परवरिश यही है कि हम उसे यह एहसास कराएँ कि वह जैसी है, वैसी ही पर्याप्त है। उसे यह भरोसा हो कि उसकी संवेदनशीलता, उसकी भावनाएँ और उसका अपनापन किसी बोझ नहीं बल्कि उसकी शक्ति हैं।
माँ और बेटी का आपसी जुड़ाव केवल भावनाओं तक सीमित नहीं रहता। यह रिश्ता बेटी के पूरे व्यक्तित्व को गढ़ता है। माँ जब बेटी के भीतर आत्मसम्मान, शिष्टाचार, दृढ़ता और जिम्मेदारी के बीज बोती है, तो वही बीज आगे चलकर उसके जीवन की सफलता की नींव बनते हैं। वह समाज में आत्मविश्वास और गरिमा के साथ जीना सीखती है।
आज की पीढ़ी की बेटियाँ केवल घर तक सीमित नहीं हैं। वे विज्ञान, कला, राजनीति, खेल और व्यापार हर क्षेत्र में अपनी पहचान बना रही हैं। लेकिन उनके भीतर यह शक्ति तभी आती है जब बचपन से उन्हें अपनी असली पहचान अपनाने की स्वतंत्रता दी जाती है। बेटी को बेटी की तरह पालने का अर्थ है उसे यह सिखाना कि वह अपनी अलग पहचान पर गर्व करे। यह संदेश केवल एक माँ ही नहीं, बल्कि पूरे समाज को समझना होगा।
आख़िरकार, एक बेटी को वही बनना चाहिए जो वह वास्तव में है। उसे बेटे जैसा बनाने की ज़रूरत नहीं है, क्योंकि वह पहले से ही पूर्ण है। उसका स्त्रीत्व उसकी पहचान है, उसकी ताकत है और उसकी गरिमा है। जब माँ अपनी बेटी को यही समझाकर पालती है, तब वह न केवल एक मजबूत स्त्री बनती है बल्कि समाज को भी नई दिशा देती है।
©®पायल लक्ष्मी सोनी
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