गुरुकुल की ओर लौटें

बचपन किसी भी समाज की नींव होता है। यदि यही नींव कमजोर होने लगे तो आने वाला भविष्य संकट में पड़ सकता है। आज हम देख रहे हैं कि विद्यालयों में हिंसा की घटनाएं बढ़ रही हैं। कभी कोई बच्चा अपने साथी पर हमला कर देता है, कभी शिक्षक पर हाथ उठा देता है, और कई बार तो ऐसी घटनाएं होती हैं जो समाचार पत्रों की सुर्खियाँ बन जाती हैं। यह केवल विद्यालय या बच्चों की समस्या नहीं है, बल्कि पूरे समाज की चेतावनी है कि हमारी शिक्षा पद्धति, पारिवारिक संस्कार और जीवनशैली कहीं न कहीं अपने मूल से भटक गई है।

बच्चों में धैर्य का स्तर तेजी से घट रहा है। छोटी-सी बात पर गुस्सा करना, हिंसा का सहारा लेना और आत्मसंयम खो देना सामान्य प्रवृत्ति बनती जा रही है। इसका एक बड़ा कारण मोबाइल और वीडियो गेम्स का बढ़ता प्रभाव है। बच्चे घंटों मोबाइल पर हिंसात्मक खेल खेलते हैं, जिनमें मारना, काटना, शूट करना ही मुख्य क्रिया होती है। धीरे-धीरे यह सब उनके अवचेतन मन में बैठ जाता है और जब वे वास्तविक जीवन में किसी चुनौती या विवाद से जूझते हैं तो उसी हिंसात्मक प्रतिक्रिया को सहज मानकर अपनाते हैं। स्क्रीन की लत ने उनके धैर्य, संवेदनशीलता और सामाजिक व्यवहार को प्रभावित किया है।

लेकिन केवल तकनीक को दोष देना पर्याप्त नहीं है। असली प्रश्न यह है कि क्या हम माता-पिता और शिक्षक अपनी भूमिका सही ढंग से निभा रहे हैं? परिवार अनुशासन और संस्कार की पहली पाठशाला होता है। यदि बच्चे घर में अनुशासन, संवाद और प्रेम का संतुलन नहीं सीखते, तो बाहर जाकर उनसे आदर्श आचरण की अपेक्षा करना व्यर्थ है। कई बार माता-पिता अपने करियर और व्यस्तताओं में इतने उलझ जाते हैं कि बच्चों को समय ही नहीं दे पाते। बच्चे अकेलेपन को मोबाइल और इंटरनेट के सहारे भरते हैं और वहीं से गलत आदतें सीखते हैं। माता-पिता का अत्यधिक लाड़-प्यार भी अनुशासनहीनता को जन्म देता है। यदि हर जिद्द पूरी कर दी जाएगी तो बच्चा सीमाओं का सम्मान करना कभी नहीं सीखेगा।

यहीं हमें अपनी परंपरागत गुरुकुल शिक्षा पद्धति की याद आती है। प्राचीन भारत में शिक्षा केवल ज्ञान प्राप्त करने का माध्यम नहीं थी, बल्कि यह चरित्र निर्माण का केंद्र थी। गुरुकुल में शिष्य अनुशासन, संयम, आत्मनिर्भरता और सामूहिकता सीखते थे। वहां शिक्षा केवल पुस्तकों तक सीमित नहीं थी, बल्कि जीवन की हर छोटी-बड़ी गतिविधि में नैतिकता और जिम्मेदारी का अभ्यास कराया जाता था। शिक्षक केवल विषय पढ़ाने वाले नहीं, बल्कि जीवन गुरु होते थे, जिनका आचरण ही बच्चों के लिए आदर्श होता था। यही कारण है कि गुरुकुल से निकलने वाले शिष्य समाज के लिए आदर्श पुरुष बनते थे।

आज की शिक्षा पद्धति में यह तत्व लगभग लुप्त हो गया है। शिक्षक को केवल अंक दिलाने का साधन मान लिया गया है। माता-पिता और समाज भी शिक्षक से केवल नौकरी दिलाने योग्य शिक्षा की अपेक्षा रखते हैं। चरित्र, संस्कार और आत्मानुशासन जैसी मूल बातें पीछे छूट गई हैं। जबकि सच्चाई यह है कि यदि शिक्षा से अनुशासन और मूल्य ही लुप्त हो गए तो ज्ञान का भी कोई महत्व नहीं बचेगा।

इसलिए शिक्षक की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। शिक्षक को चाहिए कि वह केवल पाठ्यपुस्तकों तक सीमित न रहें, बल्कि बच्चों के भीतर धैर्य, सहनशीलता और करुणा जैसे मूल्यों का संचार करें। यह तभी संभव है जब शिक्षक स्वयं इन मूल्यों का आचरण करें। बच्चों के साथ संवाद और मार्गदर्शन का रिश्ता स्थापित करना आवश्यक है। उन्हें यह विश्वास दिलाना चाहिए कि समस्याओं का समाधान हिंसा में नहीं, बल्कि संवाद और संयम में है।

माता-पिता की भी उतनी ही जिम्मेदारी है। बच्चों को समय देना, उनके साथ संवाद करना, उनकी समस्याओं को सुनना और सही-गलत का मार्गदर्शन करना परिवार का कर्तव्य है। घर में टीवी और मोबाइल के अंधाधुंध प्रयोग पर रोक लगानी होगी। बच्चों के सामने स्वयं भी अनुशासन और संयम का उदाहरण प्रस्तुत करना होगा, क्योंकि बच्चे वही सीखते हैं जो वे देखते हैं।

आज के समय में “शिशु मंदिर” जैसी शिक्षा पद्धति की आवश्यकता है, जो भारतीय संस्कारों और नैतिक मूल्यों को प्राथमिकता देती है। ऐसी शिक्षा व्यवस्था जिसमें बच्चे सुबह प्रार्थना से दिन की शुरुआत करें, राष्ट्रगान गाएं, भारतीय संस्कृति और इतिहास की महिमा से परिचित हों, और अनुशासन व आत्मसम्मान को जीवन का आधार मानें। इस पद्धति में शिक्षा केवल रोजगार तक सीमित नहीं रहती, बल्कि जीवन को गढ़ने का माध्यम बनती है।

यदि हम वास्तव में समाज को हिंसा और अनुशासनहीनता से बचाना चाहते हैं तो हमें शिक्षा का केंद्र बदलना होगा। केवल आधुनिकता और तकनीक की नकल करने से काम नहीं चलेगा, बल्कि हमें अपने मूल्यों की ओर लौटना होगा। गुरुकुल की आत्मा और शिशु मंदिर की पद्धति को आधुनिक शिक्षा के साथ जोड़ना ही समाधान है। ऐसा करने से ही हम धैर्यवान, अनुशासित और संवेदनशील पीढ़ी का निर्माण कर पाएंगे।

आज आवश्यकता इस बात की है कि हम सभी माता-पिता, शिक्षक और समाज अपनी जिम्मेदारी स्वीकार करें। बच्चों को केवल सुविधाएं देने से काम नहीं चलेगा, उन्हें संस्कार और अनुशासन देना ही सच्ची जिम्मेदारी है। यदि यह किया गया तो विद्यालयों में हिंसा की जगह प्रेम और सहयोग का वातावरण होगा। तभी हम एक सशक्त, अनुशासित और संस्कारी भारत की नींव रख पाएंगे।


©®पायल लक्ष्मी सोनी 
लेखक,समीक्षक,पत्रकार

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