पाठ्य पुस्तकों में हमारी वीरांगनाएँ क्यों नहीं?
आखिर क्या कारण है कि भारत की वीरांगनाओं को हमारी पाठ्य-पुस्तकों में वह स्थान नहीं मिला, जिसकी वे वास्तव में हकदार हैं? इतिहास केवल राजाओं, युद्धों और साम्राज्यों की कहानी ही नहीं हैं। इतिहास उन महिलाओं की गाथा भी है जिन्होंने सत्ता संभाली, राज्य चलाए, प्रशासन किया, सेनाओं का नेतृत्व किया और विदेशी आक्रमणकारियों के सामने अदम्य साहस दिखाया। पन्ना धाय ने अपने पुत्र का बलिदान देकर मेवाड़ के उत्तराधिकारी की रक्षा की। रानी पद्मावती की कथा त्याग, स्वाभिमान और संघर्ष से जुड़ी है। अहिल्याबाई होलकर ने कुशल शासन का ऐसा उदाहरण प्रस्तुत किया, जिसे आज भी सुशासन के आदर्श के रूप में याद किया जाता है। जीजाबाई ने शिवाजी महाराज के व्यक्तित्व, संस्कार और राष्ट्रचेतना के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। महारानी लक्ष्मीबाई की वीरता का उल्लेख प्रायः सुभद्रा कुमारी चौहान की प्रसिद्ध कविता तक सीमित कर दिया जाता है, जबकि उनका वास्तविक संघर्ष और नेतृत्व कहीं अधिक व्यापक था। फिर रानी दुर्गावती को हम कितना जानते हैं? गोंडवाना की इस वीर रानी ने अपने राज्य की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए मुगल सेना का सामना किया...