पति परमेश्वर : सत्य और मान्यताएं
भारतीय संस्कृति में कुछ शब्द ऐसे हैं जिनका अर्थ समय के साथ बदल दिया गया, तोड़ दिया गया या आधा-अधूरा समझकर समाज में भ्रम फैलाया गया। ऐसा ही एक शब्द है-“पति परमेश्वर।” आजकल सोशल मीडिया पर अक्सर यह प्रश्न उठाया जाता है कि यदि पति परमेश्वर है, तो फिर इतिहास और पुराणों में कुछ स्त्रियों के जीवन में दुख क्यों आए? यदि शिव सती को नहीं बचा पाए, राम सीता को कष्टों से नहीं बचा पाए, पांडव द्रौपदी का चीरहरण नहीं रोक पाए, तो फिर पति को परमेश्वर क्यों कहा गया? पहली दृष्टि में यह प्रश्न तर्कपूर्ण लग सकता है, परंतु जब हम भारतीय दर्शन, शास्त्रीय अर्थ और घटनाओं की वास्तविक पृष्ठभूमि को समझते हैं, तब स्पष्ट होता है कि यह प्रश्न अधूरी जानकारी पर आधारित है। सबसे पहले यह समझना आवश्यक है कि भारतीय परंपरा में “परमेश्वर” शब्द हर जगह ईश्वर के शाब्दिक अर्थ में नहीं प्रयुक्त होता। हमारे यहाँ माता को भी देवतुल्य कहा गया, पिता को देवतुल्य कहा गया, गुरु को ब्रह्मा-विष्णु-महेश कहा गया, अतिथि को देवो भवः कहा गया। क्या इसका अर्थ यह है कि माता-पिता सचमुच देवता बन गए? नहीं। इसका आशय है सम्मान, श्रद्धा, कर्तव्य और जीवन में...