"बेटी को बेटी रहने दें"
भारतीय समाज में सदियों से यह धारणा गहरी जड़ें जमाए हुए है कि बेटा परिवार का सहारा होता है और बेटी एक जिम्मेदारी। इस सोच के कारण बेटियों के पालन-पोषण में अक्सर या तो असमानता दिखाई देती है या फिर उन्हें बेटों जैसा बनाने की कोशिश की जाती है। लेकिन क्या सच में यह आवश्यक है कि बेटी को बेटा बनाया जाए? क्या उसका अस्तित्व केवल इस बात पर निर्भर होना चाहिए कि वह कितनी ‘बेटे जैसी’ है? दरअसल, बेटी को बेटी की तरह पालना ही सबसे बड़ा उपहार है, क्योंकि तभी वह अपने स्त्रीत्व, संवेदनशीलता और आत्मबल को समझ पाती है। अक्सर हम देखते हैं कि परिवारों में जब बेटियाँ भाइयों के साथ खेलती-बढ़ती हैं तो उनमें टॉमबॉय जैसी आदतें विकसित हो जाती हैं। यह बुरी बात नहीं है, क्योंकि खेल-खेल में साहस, जोश और प्रतिस्पर्धा जैसी खूबियाँ भी विकसित होती हैं। लेकिन समस्या तब आती है जब परिवार या समाज बेटी की पहचान को ‘बेटे जैसे व्यवहार’ से जोड़कर देखना शुरू कर देता है। यह धारणा बेटी के अपने स्त्रीत्व और उसकी आंतरिक पहचान को दबा देती है। एक बेटी को बेटा बनने की ज़रूरत नहीं है, उसे तो खुद अपने रूप में पूर्णता से ज...