भारतीय नारी की पहचान सती प्रथा नहीं
भारतीय संस्कृति को समझने के लिए केवल कुछ प्रचलित धारणाओं या बाद के सामाजिक विकृतियों को आधार बनाना उचित नहीं है। सनातन परंपरा हजारों वर्षों से चली आ रही एक विशाल सांस्कृतिक धारा है, जिसमें जीवन, परिवार, धर्म, कर्तव्य, ज्ञान और नारी, सभी के विषय में अनेक दृष्टियाँ मिलती हैं। इसलिए किसी एक सामाजिक प्रथा को पूरी सनातन संस्कृति का प्रतिनिधि मान लेना इतिहास के साथ न्याय नहीं होगा।
अक्सर यह तर्क दिया जाता है कि प्राचीन भारतीय समाज में पति की मृत्यु के बाद पत्नी के लिए सती होना आवश्यक था। लेकिन यदि ऐसा कोई सार्वभौमिक धार्मिक नियम होता, तो हमारे रामायण, महाभारत और इतिहास में पति की मृत्यु के बाद अपने परिवार, समाज और राज्य का दायित्व संभालने वाली इतनी महिलाएँ कैसे दिखाई देतीं?
रामायण का उदाहरण सबसे पहले सामने आता है। राजा दशरथ की मृत्यु के बाद उनकी तीनों प्रमुख रानियाँ- कौशल्या, कैकेयी और सुमित्रा- सती नहीं हुईं। वे जीवित रहीं और अयोध्या के आगे के घटनाक्रम की साक्षी बनीं। माता कौशल्या ने श्रीराम के वनवास का दुःख सहा और उनके लौटने की प्रतीक्षा की। कैकेयी और सुमित्रा भी अपने जीवन में आगे बढ़ीं। यदि पति की मृत्यु के बाद पत्नी का सती होना कोई अनिवार्य सनातन आदेश होता, तो राजा दशरथ की रानियों का जीवन इसका स्पष्ट खंडन करता है।
महाभारत में भी माता कुंती इसका महत्वपूर्ण उदाहरण हैं। पांडु की मृत्यु के बाद कुंती ने अपने प्राण नहीं त्यागे। उन्होंने अपने पुत्रों - युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेव- के पालन-पोषण और उनके कठिन जीवन-संघर्ष में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। हस्तिनापुर की राजनीति और महाभारत की पूरी कथा में कुंती का व्यक्तित्व अत्यंत प्रभावशाली रहा।
इसी प्रकार सत्यवती के पति राजा शांतनु की मृत्यु के बाद भी वह जीवित रहीं और हस्तिनापुर के राजपरिवार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती रहीं। इससे स्पष्ट होता है कि भारतीय महाकाव्यों में विधवा स्त्री का जीवन समाप्त मान लेने की कोई एकरूप अवधारणा नहीं थी।
यहाँ ‘माता सती’ के प्रसंग को भी समझना आवश्यक है। माता सती, दक्ष प्रजापति की पुत्री और भगवान शिव की पत्नी थीं। दक्ष द्वारा भगवान शिव के अपमान से आहत होकर उन्होंने अपने प्राण त्यागे। यह प्रसंग पति की मृत्यु के बाद पत्नी द्वारा चिता में बैठने का प्रसंग नहीं था। इसलिए माता सती के नाम को बाद की सामाजिक प्रथा ‘सती’ के साथ सीधे जोड़कर सनातन संस्कृति पर आरोप लगाना उचित नहीं है।
भारतीय इतिहास में भी पति की मृत्यु के बाद अपने जीवन और दायित्व को संभालने वाली अनेक महिलाओं के उदाहरण हैं।
सबसे प्रेरणादायक उदाहरणों में अहिल्याबाई होलकर का नाम आता है। उनके पति खंडेराव होलकर की मृत्यु युद्ध में हुई। उस समय अहिल्याबाई के सामने सती होने का प्रश्न आया, लेकिन उनके ससुर मल्हारराव होलकर ने उन्हें सती होने से रोक दिया और जीवन को आगे बढ़ाने के लिए प्रेरित किया। बाद में यही अहिल्याबाई मालवा की महान शासिका बनीं। उन्होंने प्रशासन, न्याय, जनकल्याण और धार्मिक-सांस्कृतिक निर्माण के क्षेत्र में अद्भुत कार्य किए। काशी, गया, सोमनाथ, उज्जैन और अनेक तीर्थस्थलों पर उनके द्वारा कराए गए निर्माण आज भी उनकी दूरदृष्टि और सेवा भावना की याद दिलाते हैं।
यदि सनातन संस्कृति में पति की मृत्यु के बाद स्त्री का जीवन समाप्त मान लिया जाता, तो अहिल्याबाई जैसा महान अध्याय भारतीय इतिहास में लिखा ही नहीं जाता।
झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई भी इसका अद्भुत उदाहरण हैं। महाराजा गंगाधर राव की मृत्यु के बाद लक्ष्मीबाई ने जीवन समाप्त नहीं किया, बल्कि झाँसी का शासन संभाला। उन्होंने अंग्रेजी सत्ता के सामने झुकने से इनकार किया और 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में अद्वितीय वीरता दिखाई। वह केवल एक विधवा रानी नहीं थीं, बल्कि शासन, युद्ध और नेतृत्व का प्रतीक बन गईं।
कश्मीर की रानी दिद्दा का उदाहरण भी उल्लेखनीय है। पति क्षेमगुप्त की मृत्यु के बाद उन्होंने शासन की बागडोर संभाली और कश्मीर की राजनीति में प्रभावशाली भूमिका निभाई। दक्षिण भारत में रानी रुद्रमादेवी ने भी पुरुष-प्रधान राजनीतिक व्यवस्था में एक सक्षम शासक के रूप में अपनी पहचान बनाई।
रानी दुर्गावती ने पति दलपत शाह की मृत्यु के बाद गोंडवाना का शासन संभाला। उन्होंने अपने राज्य की रक्षा के लिए मुगल सेना से संघर्ष किया और युद्धभूमि में वीरगति प्राप्त की। उन्होंने अपने जीवन को समाप्त करने के बजाय अपने राज्य और प्रजा के लिए संघर्ष करना चुना।
कर्नाटक की रानी चेन्नम्मा ने भी अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष का नेतृत्व किया। आगे चलकर कित्तूर की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए उनका नाम भारतीय प्रतिरोध के इतिहास में अमर हुआ। इसी तरह ताराबाई ने अपने पति राजाराम की मृत्यु के बाद मराठा सत्ता को संभाला और औरंगजेब के विरुद्ध संघर्ष जारी रखा। इन उदाहरणों में स्त्री केवल परिवार की सदस्य नहीं थी; वह स्वयं सत्ता, नेतृत्व और प्रतिरोध की केंद्रबिंदु भी थी।
यहाँ यह स्पष्ट करना भी आवश्यक है कि इतिहास में सती की घटनाएँ यदि घटी तो उसके पीछे के कारणों पर भी शोध होना चाहिए, यहां पर रानी पद्मावती का जौहर याद आता है जिन्होंने 16000 रानियों के साथ जौहर किया जब आक्रांता खिलजी ने महल पर आक्रमण किया था ।सही तथ्यों को जानना उतना ही आवश्यक है क्योंकि उन्हें नकारना तथ्य से आँखें मूँदना होगा। लेकिन किसी ऐतिहासिक सामाजिक प्रथा का अस्तित्व और उसका सनातन धर्म का अनिवार्य धार्मिक आदेश होना दो अलग बातें हैं। मध्यकालीन भारत में कुछ क्षेत्रों और परिस्थितियों में सती की घटनाएँ हुईं। समय के साथ यह एक सामाजिक कुरीति के रूप में पहचानी गई और अंततः कानून द्वारा इसे समाप्त किया गया। कुछ समाज सुधारकों ने भी इसके विरोध में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
इसलिए हमें इतिहास को न तो छिपाना चाहिए और न ही चुनिंदा उदाहरणों के आधार पर पूरी भारतीय सभ्यता को दोषी ठहराना चाहिए।
सनातन संस्कृति की विशेषता यह है कि इसमें नारी को केवल किसी एक भूमिका में सीमित नहीं किया गया। वह गृहिणी भी है, विदुषी भी; माता भी है, योद्धा भी; पत्नी भी है, शासिका भी। वैदिक परंपरा में गार्गी और मैत्रेयी जैसी विदुषियों का उल्लेख मिलता है। देवी की अवधारणा में नारी को ‘शक्ति’ के रूप में देखा गया। दुर्गा, लक्ष्मी, सरस्वती और काली की आराधना इस सांस्कृतिक दृष्टि की प्रतीक है।
इसलिए जब कोई यह कहता है कि भारतीय संस्कृति में स्त्री का अस्तित्व पति की मृत्यु के साथ समाप्त हो जाता था, तो इतिहास स्वयं उसके सामने अनेक प्रश्न खड़े करता है, दशरथ की रानियाँ कहाँ गईं? कुंती ने जीवन क्यों जिया? अहिल्याबाई ने शासन कैसे संभाला? लक्ष्मीबाई ने तलवार क्यों उठाई? दुर्गावती ने राज्य की रक्षा क्यों की? ताराबाई ने संघर्ष क्यों जारी रखा?
इन महिलाओं ने मृत्यु नहीं, जीवन को चुना। उन्होंने पराजय नहीं, संघर्ष को चुना। उन्होंने अपने व्यक्तिगत दुःख को समाज और राष्ट्र के दायित्व से ऊपर नहीं रखा।
यही भारतीय नारी की वास्तविक शक्ति है।
सनातन की मूल चेतना जीवन, कर्तव्य, आत्मबल और शक्ति की चेतना है। भारतीय इतिहास की इन महिलाओं को केवल ‘अबला’ कहकर नहीं, बल्कि अपने समय की निर्णायक शक्ति के रूप में पढ़ने की आवश्यकता है। अहिल्याबाई होलकर से लेकर लक्ष्मीबाई तक, कुंती से लेकर रानी दुर्गावती तक- इनकी जीवनगाथाएँ बताती हैं कि भारतीय परंपरा में नारी का अर्थ केवल किसी पुरुष की पत्नी होना नहीं था।
वह स्वयं एक सम्पूर्ण व्यक्तित्व थी।
और शायद यही सनातन संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता है,नारी को केवल संरक्षण देने योग्य नहीं, बल्कि स्वयं शक्ति का स्वरूप मानना।
✍️©®पायल लक्ष्मी सोनी
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