शिक्षा का तंत्र और मानसिक दबाव: आत्महत्या

शिक्षा का तंत्र और मानसिक दबाव: आत्महत्या

अभी हाल ही में जेईई मेन 2025 के कटऑफ को लेकर एक छात्रा अदिति मिश्रा ने आत्महत्या कर ली। यह केवल एक छात्रा की व्यक्तिगत विफलता नहीं थी, बल्कि एक असंवेदनशील और अमानवीय शिक्षा प्रणाली का प्रमाण था, जो बच्चों पर जरूरत से ज्यादा दबाव डालती है। हर साल हजारों छात्र इस दबाव में आत्महत्या कर लेते हैं, और यह एक गहरी सामाजिक और शैक्षिक समस्या बन चुकी है।

लेकिन क्या यही शिक्षा का मूल उद्देश्य था? क्या भारत, जो कभी विश्वगुरु था, आज शिक्षा को केवल नंबरों और प्रतिस्पर्धा तक सीमित कर चुका है? भारतीय ज्ञान परंपरा में शिक्षा का उद्देश्य आत्मसाक्षात्कार, कौशल-विकास और ज्ञानार्जन था, न कि सिर्फ परीक्षा पास करना।

यदि हम प्राचीन भारत की ओर देखें, तो शिक्षा केवल नौकरी या सफलता तक सीमित नहीं थी। तक्षशिला, नालंदा और विक्रमशिला जैसे विश्वविद्यालयों में ज्ञान प्राप्ति का उद्देश्य केवल जीविका नहीं, बल्कि आत्मविकास था। वहां कला, विज्ञान, खगोलशास्त्र, व्याकरण, चिकित्सा और आध्यात्मिकता को समान रूप से महत्व दिया जाता था। गुरुकुल प्रणाली में विद्यार्थियों को केवल विषयों का ज्ञान नहीं, बल्कि जीवन जीने की कला भी सिखाई जाती थी।

"सा विद्या या विमुक्तये" – अर्थात, वास्तविक शिक्षा वह है जो व्यक्ति को बंधनों से मुक्त करे। लेकिन आज की शिक्षा प्रणाली तो छात्रों को मानसिक गुलामी और आत्म-संदेह में डाल रही है।

आधुनिक शिक्षा प्रणाली में अंक और प्रतिस्पर्धा ही सबकुछ बन चुके हैं। बच्चे अपने व्यक्तिगत विकास और रुचियों को छोड़कर कोचिंग संस्थानों में मशीनों की तरह दिन-रात मेहनत करते हैं, फिर भी सफलता की गारंटी नहीं होती। इस बीच, शिक्षा प्रणाली की खामियां—अत्यधिक कटऑफ, सीटों की कमी, अवसरों की असमानता—बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य को बुरी तरह प्रभावित कर रही हैं।

अदिति मिश्रा जैसी छात्राओं की आत्महत्या केवल उनके परिवारों के लिए नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए एक करारा तमाचा है। अगर एक बच्चा इस कदर हताश हो जाए कि उसे जीवन ही निरर्थक लगे, तो यह उसकी असफलता नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की विफलता है।एनसीआरबी (राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो) के आंकड़ों के अनुसार, भारत में हर दिन औसतन 35 छात्र आत्महत्या करते हैं। यह संख्या दर्शाती है कि हमें शिक्षा की प्राथमिकताओं को दोबारा परिभाषित करने की जरूरत है। केवल अंक आधारित नहीं, बल्कि कौशल-आधारित शिक्षा प्रणाली लागू हो।स्कूल और कॉलेजों में मानसिक स्वास्थ्य और काउंसलिंग अनिवार्य की जाए।एक ही परीक्षा से किसी छात्र के पूरे भविष्य का निर्णय न हो। अन्य वैकल्पिक करियर मार्ग विकसित किए जाए।बच्चों को नंबरों के आधार पर नहीं, बल्कि उनकी रुचि और प्रतिभा के आधार पर मार्गदर्शन दिया जाए। बच्चों को केवल किताबों तक सीमित करने के बजाय, योग, ध्यान, वैदिक ज्ञान, नैतिक शिक्षा और जीवन कौशल भी सिखाए जाएं।

अदिति मिश्रा की आत्महत्या हमें सोचने पर मजबूर कर देती है कि हम बच्चों को ज्ञान दे रहे हैं या उन्हें असफलता के भय में जीने पर मजबूर कर रहे हैं? अगर हमने समय रहते अपनी शिक्षा प्रणाली को नहीं बदला, तो न जाने कितने और मासूम इस बेरहम तंत्र की भेंट चढ़ते रहेंगे।

अब समय आ गया है कि हम अपने प्राचीन शिक्षा मूल्यों को पुनर्जीवित करें और ऐसी शिक्षा प्रणाली विकसित करें जो बच्चों को न सिर्फ योग्य बनाए, बल्कि उन्हें जीवन जीने की कला भी सिखाए।


©®पायल लक्ष्मी सोनी 

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