परिवार, मनोरंजन और बदलता परिदृश्य: क्या हमारे परिवार टूट रहे हैं?

परिवार, मनोरंजन और बदलता परिदृश्य: क्या हमारे परिवार टूट रहे हैं?

एक समय था जब टेलीविजन सिर्फ मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि पूरे परिवार को एक साथ जोड़ने का जरिया हुआ करता था। रविवार की सुबह दूरदर्शन पर रामायण और महाभारत देखने के लिए घर के सभी सदस्य एकत्र होते थे। हम मालगुडी डेज़, बुनियाद और हम लोग जैसे धारावाहिकों को बिना किसी झिझक के परिवार के साथ बैठकर देखते थे। विज्ञापन भी सरल होते थे, जो हमें उत्पाद बेचने के साथ-साथ नैतिकता और पारिवारिक मूल्यों का संदेश भी देते थे।

लेकिन समय बदला, और टेलीविजन तथा डिजिटल मीडिया ने भी एक नया रूप धारण कर लिया। आज, एक 10-सेकंड के विज्ञापन में भी आप अश्लीलता ढूंढ सकते हैं। धारावाहिक और वेब सीरीज ऐसे विषयों पर केंद्रित हो गए हैं, जिन्हें परिवार के साथ बैठकर देखना मुश्किल हो गया है। अब टेलीविजन और ओटीटी प्लेटफॉर्म मनोरंजन का माध्यम कम और एक एजेंडा सेट करने का जरिया ज्यादा बन चुके हैं। यह केवल एक संयोग नहीं हो सकता—बल्कि, यह सोची-समझी रणनीति भी हो सकती है।

क्या आपने कभी गौर किया है कि भारतीय पारिवारिक व्यवस्था जितनी मजबूत थी, वह धीरे-धीरे क्यों कमजोर होती जा रही है? पारिवारिक मूल्यों की जगह इंडिविजुअलिज्म (व्यक्तिवाद) को ज्यादा तवज्जो दी जा रही है। संयुक्त परिवार टूटकर छोटे-छोटे परिवारों में बंटते जा रहे हैं। जो परिवार कभी एक साथ बैठकर भोजन करते थे, अब हर सदस्य अपने-अपने मोबाइल या लैपटॉप में व्यस्त रहता है। मनोरंजन, जो कभी परिवार को जोड़ने का काम करता था, अब परिवार के सदस्यों को अलग-थलग कर रहा है।क्या यह एक बड़ी योजना का हिस्सा है? शायद हां।भारतीय समाज हमेशा से अपनी पारिवारिक एकता और संस्कारों के लिए जाना जाता रहा है। जब परिवार मजबूत होते हैं, तो समाज भी मजबूत होता है। लेकिन अगर परिवार टूट जाएंगे, तो समाज कमजोर होगा और बाहरी ताकतें इसे आसानी से नियंत्रित कर सकेंगी।पश्चिमी देशों में पहले ही न्यूक्लियर फैमिली मॉडल (छोटे परिवारों का मॉडल) को बढ़ावा दिया गया और अब वहां सिंगल पेरेंट कल्चर तेजी से बढ़ रहा है। वहां रिश्ते टिकाऊ नहीं रह गए हैं और लोग परिवार की बजाय व्यक्तिगत स्वतंत्रता को ज्यादा प्राथमिकता देते हैं। क्या यही मॉडल अब भारत में थोपा जा रहा है?पहले के विज्ञापनों को याद कीजिए—लिज्जत पापड़ का सीधा-सादा प्रचार, हमारा बजाज जैसा गर्व से भरा विज्ञापन, निरमा का पारिवारिक माहौल वाला जिंगल। लेकिन आज?                       अब आप देखेंगे कि साबुन, परफ्यूम, चॉकलेट या यहां तक कि मोबाइल कंपनियों के विज्ञापनों में भी अनावश्यक रूप से अश्लीलता दिखाई जाती है। परफ्यूम का मतलब अब सिर्फ आकर्षण और वासना भड़काना रह गया है। हर प्रोडक्ट को इस तरह से बेचा जाता है मानो उसका सीधा संबंध शारीरिक आकर्षण से हो। यह सिर्फ एक मार्केटिंग स्ट्रेटेजी नहीं, बल्कि लोगों के दिमाग में एक खास तरह की मानसिकता भरने की कोशिश भी हो सकती है।                     पहले के धारावाहिक जहां रिश्तों की गरिमा को दिखाते थे, वहीं आज की वेब सीरीज में विवाहेतर संबंध, ड्रग्स, हिंसा और अराजकता को महिमामंडित किया जा रहा है। पारिवारिक रिश्तों को हास्यास्पद और बेड़ियों जैसा दिखाया जाता है। इसका असर यह हो रहा है कि नई पीढ़ी पारिवारिक मूल्यों से दूर होती जा रही है और रिश्तों को बोझ समझने लगी है। 

                   अगर आप अन्य समाज को देखें, तो वहां टेलीविजन और आधुनिक मनोरंजन पर काफी हद तक रोक होती है। उनके परिवारों में एकता बनी रहती है, उनके रीति-रिवाज और परंपराएं आज भी मजबूत हैं। बच्चों को शुरुआत से ही परिवार और समाज के मूल्यों का पाठ पढ़ाया जाता है। यही कारण है कि उनके परिवार अब भी मजबूती से टिके हुए हैं।

इसके विपरीत, भारतीय हिंदू समाज में टीवी और आधुनिक मनोरंजन ने पारिवारिक रिश्तों में धीरे-धीरे दरार डाल दी है। पहले माता-पिता और बच्चे एक साथ बैठकर रामायण-महाभारत देखते थे, अब वे अपने-अपने कमरे में अलग-अलग वेब सीरीज और वीडियो देखते हैं। पहले घरों में धार्मिक और सांस्कृतिक चर्चाएं होती थीं, अब फिल्मों और ट्रेंडिंग कंटेंट पर चर्चा होती है। अब इसका समय रहते समाधान भी आवश्यक है। टीवी, मोबाइल और इंटरनेट पर बिताए जाने वाले समय को सीमित करें। कोशिश करें कि रोजाना कुछ समय परिवार के साथ बिताए। परिवार के साथ देखने लायक कार्यक्रमों को प्राथमिकता दें। धार्मिक, ऐतिहासिक और प्रेरणादायक सामग्री पर ज्यादा ध्यान दें। उन्हें बताएं कि हर चीज जो स्क्रीन पर दिख रही है, वह वास्तविकता नहीं होती। उनकी सोच को सही दिशा में मोड़ें।अगर संभव हो तो परिवार को एकजुट रखने की कोशिश करें। संयुक्त परिवार की संस्कृति को फिर से अपनाएं। यह पहचानना जरूरी है कि कौन-सी ताकतें हमारे समाज को कमजोर करना चाहती हैं। मीडिया के प्रभाव को समझें और जागरूक बनें।

      मनोरंजन का उद्देश्य हमेशा से लोगों को जोड़ना रहा है, लेकिन आज यह विभाजन का कारण बनता जा रहा है। हमें यह समझने की जरूरत है कि जो कंटेंट हमें परोसा जा रहा है, वह केवल "एंटरटेनमेंट" नहीं बल्कि एक प्रोग्रामिंग भी है, जो हमारी सोच, आदतों और सामाजिक संरचना को प्रभावित कर रहा है।अगर हम अपने परिवारों को मजबूत रखना चाहते हैं, तो हमें यह तय करना होगा कि हम क्या देखें, कितना देखें और किसके साथ देखें। संयुक्त परिवार हमारी ताकत हैं, और इसे बनाए रखना हमारी जिम्मेदारी भी है।अब फैसला आपका है—आप इस बदलाव को स्वीकार करेंगे या अपने परिवार और समाज को बचाने के लिए कदम उठाएंगे?

©®पायल लक्ष्मी सोनी 

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