वंदनीया लक्ष्मीबाई केलकर: नारी शक्ति का जागरण पुंज। (5 जुलाई संकल्प दिन विशेष)
भारतीय समाज में जब नारी को सीमित भूमिकाओं में परिभाषित किया जा रहा था, उस समय एक तेजस्विनी नारी ने न केवल सामाजिक परंपराओं को चुनौती दी, बल्कि नारी जीवन को एक व्यापक, ऊर्जस्वी और राष्ट्रोन्मुख दिशा दी। वे थीं वंदनीया लक्ष्मीबाई केलकर — जिनका जीवन, विचार और कार्य आज भी नारी संगठन और राष्ट्र सेवा की जीवंत प्रेरणा हैं।
व.लक्ष्मीबाई केलकर (मौसी जी) का जन्म "आषाढ़ शुक्ल पक्ष दशमी, (विक्रम संवत् 1962) ग्रेगॅरियन कैलेंडर के अनुसार 6 जुलाई 1905 को नागपुर में हुआ। जन्म के समय ही उनकी तेजस्विता देखकर डॉक्टर ने उन्हें “कमल” नाम दिया। माता-पिता सामाजिक कार्यों में समर्पित थे और घर का वातावरण राष्ट्रप्रेम व सामाजिक जागरण से ओतप्रोत था। बाल्यकाल में मिशनरी विद्यालय के अनुभवों और घर की हिंदू संस्कृति में मिले द्वंद्व ने उन्हें आत्मचिंतन की ओर उन्मुख किया। उन्होंने दृढ़ता से मिशनरी स्कूल छोड़ ‘हिंदू मूलांची शाला’ में प्रवेश लिया, जो आगे चलकर उनकी वैचारिक स्थिरता का आधार बनी।
कमल, जो आगे चलकर लक्ष्मीबाई बनीं, उनमें आरंभ से ही सामाजिक सक्रियता थी। चाहे वह गोवध विरोधी आंदोलन में भाग लेना हो या प्लेग महामारी में सेवा—उन्होंने समाज को अपने कर्म से बताया कि नारी केवल करुणा नहीं, साहस और संकल्प की भी मूर्ति है। वे अन्याय और भेदभाव के विरुद्ध आवाज़ उठाने लगी थीं। समाज के प्रतिष्ठित वकील पुरुषोत्तम राव केलकर से उनका विवाह हुआ, और विवाह के बाद वे लक्ष्मीबाई कहलायी।
महज 27 वर्ष की उम्र में पति की मृत्यु ने उनके जीवन में तूफान ला दिया। छह बच्चों की जिम्मेदारी, विधवा ननद का पालन, और साथ ही आर्थिक संकट—इन सबने उन्हें झकझोरा, पर तोड़ा नहीं। उन्होंने घर के कमरे किराए पर देकर स्वयं को आत्मनिर्भर बनाया। उसी दौरान उनके पुत्र राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखा में जाने लगे, और उनके व्यवहार में आए परिवर्तन से लक्ष्मीबाई प्रभावित हुईं। उन्होंने संघ के संस्थापक डॉ. हेडगेवार से भेंट की। अपने गहरे चिंतन और संगठन की आवश्यकता के विश्लेषण को उन्होंने इतनी स्पष्टता से रखा कि डॉ. हेडगेवार स्वयं प्रभावित हुए।
यह वही क्षण था जब ‘राष्ट्र सेविका समिति’ का बीज रोपा गया। 1936 में विजयादशमी के दिन वर्धा में इसकी स्थापना हुई। यह संगठन महिलाओं के लिए था, पर इसकी वैचारिक रीढ़ थी—राष्ट्र, धर्म, सेवा और संस्कृति। लक्ष्मीबाई ने स्पष्ट रूप से स्वीकार किया कि महिलाएं न केवल घर की निर्माता हैं, बल्कि समाज और राष्ट्र की आधारशिला भी। वे मानती थीं कि यदि पुरुष राष्ट्र कार्य में योगदान दे सकते हैं, तो स्त्रियां भी उतनी ही समर्थ हैं। लेकिन इसके लिए उन्हें आत्मबल, अनुशासन, और बौद्धिक विकास के प्रशिक्षण की आवश्यकता है।
समिति की शुरुआत भले ही कुछ बहनों के साथ हुई, लेकिन मौसी जी के सतत प्रवास, प्रेरक भाषणों और संगठन के प्रति समर्पण से यह संगठन शीघ्र ही महाराष्ट्र और फिर पूरे भारत में फैलने लगा। समिति की शाखाओं में शारीरिक व्यायाम, योग, नियुद्ध, छुरिका, शौर्य गीत, भजन, भाषण कला और भारतीय संस्कृति का अध्ययन प्रमुख अंग बनाए गए। वे चाहती थीं कि हर सेविका ‘अष्टभुजा’ का जीवंत स्वरूप बने—जिसके पास शौर्य भी हो, करुणा भी, ज्ञान भी हो और सेवा भी।
मौसी जी के नेतृत्व में समिति केवल शाखा केंद्र नहीं रही, वह हिंदू नारी चेतना का केंद्र बन गई। उन्होंने जीजाबाई के मातृत्व, अहिल्याबाई होलकर के कर्तृत्व और रानी लक्ष्मीबाई के नेतृत्व को महिलाओं के लिए आदर्श बताया। उन्होंने समिति में योग, व्यायाम, भाषण कला और बौद्धिक विकास के कार्यक्रम शुरू करवाए। वे स्वयं रामायण पर प्रवचन देतीं, और उससे होने वाली आय से समिति के कार्यालय बनवातीं।
1945 में राष्ट्र सेविका समिति का पहला राष्ट्रीय सम्मेलन हुआ। लेकिन सबसे साहसिक प्रसंग है 1947 का। जब देश का विभाजन हुआ, कराची में हिंदू स्त्रियां भय, हिंसा और अपमान की स्थिति में थीं। ऐसे समय में मौसी जी और वेणु ताई ने कराची जाकर वहां 1200 से अधिक महिलाओं को छत पर एकत्र किया। पाकिस्तान का स्वतंत्रता दिवस था, लेकिन हिंदू महिलाओं के लिए वह त्रासदी का दिन था। मौसी जी ने उन्हें धैर्य दिया, संगठन का आश्वासन दिया और वचन दिया कि भारत पहुँचने पर हर बहन को सुरक्षा मिलेगी। जब वे बहनें भारत आईं, तो मौसी जी ने उन्हें मुंबई में गोपनीयता से सुरक्षित परिवारों में आश्रय दिलवाया।
यह केवल सामाजिक कार्य नहीं था, यह मातृशक्ति के आत्मगौरव को पुनः प्रतिष्ठित करने का यज्ञ था। ऐसा यज्ञ, जिसकी लौ आज भी समिति की प्रत्येक शाखा में जल रही है।
उनकी दृष्टि केवल शाखा विस्तार तक सीमित नहीं थी। उन्होंने बाल मंदिर, छात्रावास, योग केंद्र, भजन मंडल, औषधालय, शिक्षण संस्थाएँ, और महिला उद्यमिता के केंद्र प्रारंभ किए। उन्होंने सेविकाओं को साइकिल चलाना, स्वयं कार्यक्रम आयोजित करना और वक्तृत्व कला में दक्ष होने के लिए प्रोत्साहित किया। उनका मानना था कि तेजस्वी मन, सशक्त शरीर और आध्यात्मिक दृष्टि—एक सेविका की पहचान होनी चाहिए।
मौसी जी का चिंतन यह नहीं था कि स्त्री पुरुष की प्रतिद्वंद्वी बने, बल्कि यह था कि वह अपनी पहचान को जानकर समाज के निर्माण में साझेदार बने। वे कहती थीं —
"स्त्री यदि दुर्बल होगी, तो परिवार बिखरेगा और समाज दुर्बल होगा।"
उनका संपूर्ण जीवन एक आदर्श सेविका का जीवन था—त्याग, अनुशासन, सेवा और संकल्प से युक्त। उन्होंने न केवल संगठन की नींव रखी, बल्कि उसे पुष्पित, पल्लवित, और स्थाई बनाया। 27 नवंबर 1978 को जब उनका देहावसान हुआ, तब तक वे लाखों बहनों के जीवन में चेतना की लौ जला चुकी थीं।
आज, राष्ट्र सेविका समिति विश्व का सबसे बड़ा राष्ट्रीय महिला संगठन है। यह संगठन राजनीति से परे रहकर सामाजिक एवं व्यवहारिक रूप से राष्ट्र निर्माण में कार्य कर रहा है। उसकी सेविकाएं शिक्षण, सेवा, संस्कार, और संगठन की नींव पर समाज के हर कोने में संस्कारों की रोशनी फैला रही हैं।
वंदनीया लक्ष्मीबाई केलकर — यह नाम आज केवल एक व्यक्ति का नहीं, एक विचार का, एक प्रेरणा का, और एक विराट कार्यशैली का प्रतीक बन चुका है। उन्होंने यह सिद्ध किया कि नारी केवल पूजा की वस्तु नहीं, बल्कि संगठन, संस्कृति और समाज निर्माण की आधारशिला है।
उनका जीवन यह बताता है कि यदि संकल्प सच्चा हो, तो एक अकेली नारी भी समाज की दिशा बदल सकती है। उन्होंने एक सपना देखा — एक संगठित, संस्कारित, सशक्त नारी शक्ति का, और उसे साकार कर दिखाया।
आज जब हम 5 जुलाई को संकल्प दिन के रूप में मनाते हैं, तो यह केवल स्मरण का दिन नहीं, बल्कि आत्मनिरीक्षण और पुनः प्रेरणा का दिन है। मौसी जी की साधना, त्याग और संकल्प को आत्मसात कर हम सब मिलकर मातृशक्ति को जाग्रत करें — यही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
©®पायल लक्ष्मी सोनी
लेखिका पत्रकार एवं समीक्षक
लखनऊ
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