स्त्री: सृजन, शिक्षा और समाज की शक्ति
स्त्री: सृजन, शिक्षा और समाज की शक्ति
पूरे ब्रह्मांड में एक ही चेतना प्रवाहित है, जो समस्त सृष्टि का आधार है। इस चेतना के विभिन्न रूप हैं—प्रकृति, प्राणी, मानव, और समस्त जीव-जगत। सभी परस्पर जुड़े हुए हैं, एक-दूसरे के पूरक हैं। इस धारा में स्त्री की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि वह न केवल जीवन को जन्म देने की शक्ति रखती है, बल्कि समाज, संस्कृति और सभ्यता की संरक्षक भी है।
वैदिक काल से ही स्त्रियों को समाज में उच्च स्थान प्राप्त था। उन्हें शिक्षा का अधिकार था, वे यज्ञ संपन्न करती थीं, शास्त्रार्थ में भाग लेती थीं, शासन चलाती थीं और यहां तक कि युद्ध तक में अपनी भूमिका निभाती थीं। गार्गी, मैत्रेयी, अपाला और लोपामुद्रा जैसी विदुषियों ने वेदों की ऋचाएं लिखीं, ब्रह्मवादिनी बनीं, और अपने ज्ञान से समाज को दिशा दी।
स्त्रियों को न केवल शिक्षा, बल्कि विवाह और जीवन के अन्य निर्णय लेने की स्वतंत्रता भी प्राप्त थी। वे राजनीति, अर्थव्यवस्था और धार्मिक कार्यों में समान रूप से भागीदार थीं। वैदिक ग्रंथों में ऐसे अनेक उल्लेख मिलते हैं, जो यह सिद्ध करते हैं कि समाज में स्त्रियों को सम्मान और सुरक्षा प्राप्त थी, और उन्हें अपनी क्षमताओं को पूर्ण रूप से विकसित करने के अवसर दिए जाते थे।
रामायण और महाभारत में भी हमें ऐसी कई स्त्रियां मिलती हैं, जिन्होंने अपने ज्ञान, शौर्य और नीति से समाज को प्रभावित किया। सीता, द्रौपदी, कुंती, शकुंतला जैसी नारियां न केवल परिवार की धुरी थीं, बल्कि उन्होंने सामाजिक मूल्यों की पुनःस्थापना में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया।
भारत के इतिहास में रानी लक्ष्मीबाई, अहिल्याबाई होल्कर, झलकारीबाई जैसी वीरांगनाओं ने यह साबित किया कि स्त्रियां केवल परिवार तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे रणभूमि में भी उतनी ही सक्षम हैं। स्वतंत्रता संग्राम में भी उन्होंने क्रांतिकारी भूमिका निभाई—सरोजिनी नायडू, मदर कामिनी, दुर्गा भाभी जैसी महिलाओं ने अपनी बहादुरी से अंग्रेजों की सत्ता को हिलाकर रख दिया।
लेकिन समय के साथ-साथ समाज में कई कुरीतियां घर कर गईं। विदेशी आक्रमणों और सांस्कृतिक बदलावों ने महिलाओं की स्वतंत्रता को सीमित कर दिया। मुगलों और बाद में अंग्रेजों के शासनकाल में स्त्रियों की शिक्षा और सामाजिक भागीदारी कम होती गई। बाल विवाह, सती प्रथा और पर्दा प्रथा जैसी कुप्रथाओं ने स्त्रियों की स्वतंत्रता को बाधित किया।
हालांकि, समाज सुधारकों ने इस स्थिति को बदलने का प्रयास किया। राजा राममोहन राय, ईश्वरचंद्र विद्यासागर, महात्मा गांधी, सावित्रीबाई फुले और पंडिता रमाबाई जैसे महापुरुषों ने स्त्रियों की शिक्षा और अधिकारों के लिए आंदोलन चलाए। इसके परिणामस्वरूप सती प्रथा समाप्त हुई, बाल विवाह पर रोक लगी और विधवा पुनर्विवाह को कानूनी मान्यता मिली।
भारत को स्वतंत्रता प्राप्त हुए 75 वर्ष से अधिक हो चुके हैं। इस दौरान स्त्रियों ने हर क्षेत्र में अपनी जगह बनाई है। शिक्षा, विज्ञान, राजनीति, खेल, कला, रक्षा—हर क्षेत्र में उन्होंने अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया है।
आज महिलाएं उच्च शिक्षा प्राप्त कर रही हैं, डॉक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक, प्रशासक और उद्यमी बन रही हैं। प्रबंधन, पर्यावरण संरक्षण, सामाजिक सुधार और समावेशी विकास जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में उनकी भागीदारी बढ़ी है। वे आत्मनिर्भर बन रही हैं, अपनी आवाज़ बुलंद कर रही हैं और समाज में अपनी भूमिका को पुनः स्थापित कर रही हैं।
स्वामी विवेकानंद ने कहा था कि यदि समाज को ऊंची उड़ान भरनी है, तो उसे दोनों पंखों—स्त्री और पुरुष—को समान रूप से सशक्त करना होगा। स्त्रियों को शिक्षा देना ही उनके सशक्तिकरण का मूल आधार है। एक शिक्षित स्त्री न केवल स्वयं सशक्त होती है, बल्कि पूरे परिवार और समाज को नई दिशा देती है।
महिलाओं की भागीदारी केवल आर्थिक या सामाजिक पहलुओं तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि उन्हें हर स्तर पर निर्णय लेने की स्वतंत्रता मिलनी चाहिए। वे परिवार और समाज की संरचना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं, संस्कारों को अगली पीढ़ी तक पहुंचाती हैं, और सांस्कृतिक विरासत की संवाहक होती हैं।
हालांकि, आज भी समाज में कई चुनौतियां बनी हुई हैं। दहेज प्रथा, घरेलू हिंसा, लैंगिक असमानता और कार्यस्थल पर भेदभाव जैसी समस्याएं अब भी मौजूद हैं। महिलाओं को अपनी सुरक्षा, सम्मान और अधिकारों के लिए निरंतर संघर्ष करना पड़ता है।
लेकिन बदलते समय के साथ महिलाएं भी अधिक सशक्त हो रही हैं। वे अपने अधिकारों के प्रति जागरूक हैं, अपने हक के लिए आवाज़ उठा रही हैं और समाज की मानसिकता को बदलने का प्रयास कर रही हैं।
स्त्रियां केवल शरीर की सुरक्षा तक सीमित नहीं हैं, बल्कि उन्हें अपने आत्मसम्मान, विचार, स्वतंत्रता और पहचान की रक्षा करने के लिए भी समर्थ बनना होगा। वंदनीया लक्ष्मीबाई केलकर ने सही कहा है कि "स्त्रियों को सुरक्षित और सशक्त बनना चाहिए।" लेकिन यह सुरक्षा केवल बाहरी नहीं होनी चाहिए, बल्कि मानसिक, बौद्धिक और आत्मिक स्तर पर भी होनी चाहिए।
जब महिलाएं शिक्षित और आत्मनिर्भर होंगी, तब समाज में एक सकारात्मक परिवर्तन आएगा। पारिवारिक संरचना और सामाजिक संतुलन तभी संभव है जब महिलाओं को बराबरी का स्थान और अवसर दिया जाए।
महिलाएं केवल परिवार और समाज का आधार ही नहीं हैं, बल्कि वे संस्कृति, परंपरा और उन्नति की वाहक भी हैं। जब वे स्वतंत्र और सशक्त होंगी, तो समाज भी समृद्ध और विकसित होगा।
समाज में स्त्रियों की भूमिका केवल घरेलू कार्यों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। उन्हें समान अवसर मिलने चाहिए, ताकि वे अपनी क्षमताओं को पहचान सकें और राष्ट्र के विकास में सक्रिय भूमिका निभा सकें।
वर्तमान युग में महिलाओं की शिक्षा, सुरक्षा और स्वतंत्रता के लिए किए जा रहे प्रयासों को और अधिक गति देने की आवश्यकता है। तभी एक ऐसा समाज संभव होगा, जहां स्त्री और पुरुष समानता के साथ आगे बढ़ें और राष्ट्र को एक नई ऊंचाई पर ले जाएं।
"सर्वे भवंतु सुखिनः"—यह मंत्र केवल पुरुषों के लिए नहीं, बल्कि समस्त मानवता के लिए है। एक समृद्ध, संतुलित और सशक्त समाज का निर्माण तभी होगा, जब हम महिलाओं को भी समान अधिकार, सुरक्षा और सम्मान देंगे।
©®पायल लक्ष्मी सोनी
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